. मुख्य विशेषताएं (Key Features)
- फूल का वजन (Curd Weight): इसके एक फूल (Curd) का वजन लगभग 500 से 800 ग्राम तक होता है, जो बाजार में बिक्री के लिए एकदम सही माना जाता है। [1]
- आकर्षक रंग और कसावट: इसके फूल ठोस (compact), गठे हुए और आकर्षक दूधिया सफेद (White) रंग के होते हैं, जिन्हें हरे पत्ते अच्छी तरह ढक कर रखते हैं। [1, 2]
- पत्तियों का आवरण (Self-Blanching): इस किस्म में पत्तियां फूल को चारों तरफ से अच्छी तरह ढक लेती हैं, जिससे फूल सीधी धूप और धूल से बचे रहते हैं और उनका सफेद रंग खराब नहीं होता। [1]
- बाजार में मांग: इसके फूलों की बनावट और ताजगी लंबे समय तक बनी रहने के कारण इसे मंडियों में अच्छे दाम मिलते हैं। [1]
2. बुवाई का समय (Sowing Season)
- इसे मुख्य रूप से शरद ऋतु (Winter/Cool Season) की फसल के रूप में उगाया जाता है।
- उत्तर और मध्य भारत के मैदानी इलाकों में इसकी नर्सरी तैयार करने का सबसे सही समय अगस्त से सितंबर का महीना होता है। [1, 2]
3. नर्सरी और रोपाई (Nursery & Transplanting)
- नर्सरी तैयार करना: बीजों को पहले प्रो-ट्रे या उठी हुई क्यारियों (Raised beds) में बोया जाता है। बीजों को फंगस जनित रोगों (जैसे डैम्पिंग ऑफ) से बचाने के लिए बोने से पहले टैग्रोन 35 WS (मेटालेक्सिल 35% WS) जैसी दवा से बीज उपचार करना बेहद फायदेमंद होता है। [1, 2]
- रोपाई (Transplanting): जब नर्सरी में पौधे 20 से 25 दिन के हो जाएं (या उनमें 4-5 पत्तियां आ जाएं), तब उन्हें मुख्य खेत में लगा दिया जाता है। [1]
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. मुख्य विशेषताएं (Key Features)
- फूल का वजन (Curd Weight): इसके एक फूल (Curd) का वजन लगभग 500 से 800 ग्राम तक होता है, जो बाजार में बिक्री के लिए एकदम सही माना जाता है। [1]
- आकर्षक रंग और कसावट: इसके फूल ठोस (compact), गठे हुए और आकर्षक दूधिया सफेद (White) रंग के होते हैं, जिन्हें हरे पत्ते अच्छी तरह ढक कर रखते हैं। [1, 2]
- पत्तियों का आवरण (Self-Blanching): इस किस्म में पत्तियां फूल को चारों तरफ से अच्छी तरह ढक लेती हैं, जिससे फूल सीधी धूप और धूल से बचे रहते हैं और उनका सफेद रंग खराब नहीं होता। [1]
- बाजार में मांग: इसके फूलों की बनावट और ताजगी लंबे समय तक बनी रहने के कारण इसे मंडियों में अच्छे दाम मिलते हैं। [1]
2. बुवाई का समय (Sowing Season)
- इसे मुख्य रूप से शरद ऋतु (Winter/Cool Season) की फसल के रूप में उगाया जाता है।
- उत्तर और मध्य भारत के मैदानी इलाकों में इसकी नर्सरी तैयार करने का सबसे सही समय अगस्त से सितंबर का महीना होता है। [1, 2]
3. नर्सरी और रोपाई (Nursery & Transplanting)
- नर्सरी तैयार करना: बीजों को पहले प्रो-ट्रे या उठी हुई क्यारियों (Raised beds) में बोया जाता है। बीजों को फंगस जनित रोगों (जैसे डैम्पिंग ऑफ) से बचाने के लिए बोने से पहले टैग्रोन 35 WS (मेटालेक्सिल 35% WS) जैसी दवा से बीज उपचार करना बेहद फायदेमंद होता है। [1, 2]
- रोपाई (Transplanting): जब नर्सरी में पौधे 20 से 25 दिन के हो जाएं (या उनमें 4-5 पत्तियां आ जाएं), तब उन्हें मुख्य खेत में लगा दिया जाता है। [1]





